सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं, कलेक्टर की प्रतिष्ठा लगी दाव पर।

लो भैया फिर आ गया फिर एक नई खबर के साथ सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार चर्चा चौराहे पर चल रही थी, कुछ लोग आपस में चर्चा कर रहे थे, नगर में कुछ दिनों से अजीब चल रहा है, कभी एसडीएम तो कभी तहसीलदार, कभी टी आई तो कभी पुलिस कर्मचारी नाका चौराहे के पास एक ऑफिस के बाहर, बार-बार आकर एक ही व्यक्ति को समझा रहे हैं, कभी उसको बिठाकर कलेक्टर कार्यालय ले जाते हैं तो कभी कलेक्टर कार्यालय खुद उसके पास चलकर आता है, आखिर यह शख्स कौन है..? यह क्या चाहता है..? इसकी कोई सुन क्यों नहीं रहा..? बीते मंगलवार को तो यह धरने पर ही बैठ गया, तभी प्रशासन का पेज फंसा, दूसरे दिन राज्यपाल आने वाले थे , कैसे भी करके इसका निपटारा करना, क्योंकि डर था कि पिछली बार भी यानी आज से लगभग 15-20 दिन पहले, कृषि के कार्यक्रम में कलेक्टर साहब के सामने बीच में ही मंत्री महोदय को रोक लिया, और एक सवाल कर डाला, वह सवाल क्या था हम आपको बताते हैं, उनका सीधा सा सवाल था, की सरकार की यह कैसी योजना, आपके गांव में ही पानी नहीं और आपके विधानसभा क्षेत्र में, कलेक्टर के द्वारा विभिन्न चीजों पर उपलब्धि प्राप्त करते हुए अवार्ड लिए गए, उसने सीधा सा फंडा बताया के पानी वाले ऑफिस में से उसे एक सूची मिली है जिसमें उन गांव का जिक्र है जहां पर पानी की टंकी बनकर पूर्ण हो गई हैं, इस पानी वाले ऑफिस का कहना है, कि हमने हमारा काम पूर्ण करके पंचायत को हैंडोवर कर दिया है, अब पंचायत जाने और उसका काम जाने, इस व्यक्ति का कहना है, जिन गांव की सूची दी है, उसमें से सिर्फ पांच गांव में ऐसे चुन लीजिये जहां पर काम पूर्ण हो गया होगा, वहां जाकर हमें निरीक्षण करवा दे, यह फंडा लगभग 20 से 25 दिन से चल रहा है वह भी नगर के मुख्य चौराहे पर, और सांसद और विधायक के कार्यालय से महज कुछ कदम की ही दूरी पर, सबसे बड़ी बात तो यह है, कुछ लोगों को लेकर बैठा है, पर अपने हित के लिए नहीं आदिवासी किसानों के हित के लिए, इसका सीधा सा कहना है, की जनता का पैसा है सरकार खर्च करती है, पर उसका सदुपयोग हो, जनता का पैसा जनता को ही नहीं लग रहा, और योजनाओं में पलीता लग रहा है, यह व्यक्ति पिछले मंगलवार को भी पानी वाले ऑफिस के गेट के बाहर धरने पर बैठा था बताया जा रहा है कि दिन था मंगलवार यानी आज से ठीक एक हफ्ते पहले, दिन भर धरना आंदोलन हुआ समझाईश वगैरा हुई, पिछले हफ्ते का मंगलवार पूरा निकल गया पर यह एक न माना, फिर दूसरे दिन बुधवार को सम्मानीय एसडीएम साहब आए, और समझाइश के तौर पर, एक हफ्ते का दावा करके उनका ज्ञापन लिया, जिसकी सारी वीडियो सोशल मीडिया प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रसारित हुई, पर जब यह व्यक्ति प्रतिज्ञा के अनुसार लगभग एक हफ्ते बाद फिर अगले मंगलवार को पहुंचा तो वही पहले के पहले दिन ना कोई कार्यवाही हुई नहीं कोई कागज चला आज फिर यह व्यक्ति धरने पर बैठा, इसके धरने पर बैठने के बाद काफी समझाइश के बाद बताया जा रहा है कि ताबड़तोड़ में  एक पत्र कलेक्टर कार्यालय से जल विभाग को जारी किया गया फलाना संगठन ने बीते हफ्ते आपको एक आवेदन दिया था, उसे आवेदन की तुरंत जांच की जाए। अब ताबड़तोड़ में पत्र देकर समझा गए तहसीलदार पर थोड़ी देर बाद जब उसने पत्र पढ़ा की एक टीम का गठन कर कार्यवाही की जाए, तो वह व्यक्ति थोड़ा संतुष्ट हुआ पर उसने एक बात रखी कि पहले यह बताया जाए कि इस टीम में कौन लोग होंगे, तब पानी विभाग ने एक पत्र जारी किय था वह उसके हाथ में थमा दिया, यह व्यक्ति जो आंदोलन खत्म कर कर अपने घर जाने वाला था, वह पत्र देख कर भड़क गया। कि यह कैसा शासन का आदेश, की छोटा कर्मचारी की अपने वरिष्ठ अधिकारी के कार्य की जांच करें, यानी उसे पत्र में जो टीम बनाई गई थी, उसमें संबंधित विभाग के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं था, और सबसे मजे की बात तो यह देखिए, की एक छोटा अधिकारी की टीम गठित की गई, जो अपने वरिष्ठ अधिकारी के काम की जांच करेगा, बस फिर क्या था इस बात पर वह व्यक्ति एड गया, किया कैसे संभव है कि एक छोटा व्यक्ति अपने वरिष्ठ अधिकारी की जांच करें, या तो इस टीम में कोई अतिरिक्त विभाग के व्यक्ति जिनका टीम बना कर पूर्ण तरीके से जांच की जाना चाहिए, अन्यथा मैं यह आंदोलन समाप्त नहीं करूंगा। बस इतनी बात पानी विभाग का बड़ा अधिकारी ज़ल्ला गया। और उसने आनन फानन में थाना कोतवाली को एक पत्र लिखकर इस व्यक्ति के खिलाफ Fir की मांग कर दी। पर इस अधिकारी व्यक्ति ने एक पल भी यह नहीं सोचा कि मैं वह काम करूं जिस पर कलेक्टर के प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, और सारी चीजों की सत्यता को उजागर करके दूध का दूध और पानी का पानी कर दू, ताकि कलेक्टर  की प्रतिष्ठा पर दाग न लगे, पर कहां यह तो पूरे विभाग के लोग, बस एक ही बात पर अड़ गए कि इसको भगाओ इसको जेल में डालो, "अरे भाई जनता का पैसा है जवाब तो जनता को देना ही पड़ेगा।" इन्होंने आवेदन में स्पष्ट लिख दिया की कार्यालय में घुस के धरना कर रहे हैं, जो कि सरासर झूठ था, व्यक्ति कार्यालय के बाहर धरना दे रहा है। और प्रोटेस्ट कर रहे हैं, व्यक्ति को अपने हक के लिए शांतिपूर्वक तरीके से आवाज उठाने की पूरी स्वतंत्रता है जो उसका मौलिक अधिकार है, और भारतीय संविधान के अनुसार उसकी यह स्वतंत्रता कोई छीन नहीं सकता,
        इतने में एक व्यक्ति पीछे से बोला , क्यों भाई झोल तो लग रहा है, और लगता है झोल भी इन्होंने हीं किया है जो पानी विभाग के अधिकारी हैं, क्योंकि भैया जांच करने वाले अधिकारी है, सूची बनाने वाले यह, और तोह मत लगे कलेक्टर पर, यह कैसे संभव हो सकता है, यदि कलेक्टर गलत होता तो जांच के आदेश जारी नहीं करते, तो भैया गलत तो यह अधिकारी लोग ही होंगे जो कलेक्टर की प्रतिष्ठा पर दाग लगने का जरा भी मलाल नहीं, और इस आंदोलन करता को हटाने के लिए पुलिस पर दबाव बना रहे। तो इस कहानी में कलेक्टर भी अपनी जगह सही है, और यह आंदोलन करने वाले व्यक्ति भी, और यदि कोई गड़बड़ी कर रहा है तो वह है पानी विभाग के अधिकारी।
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